प्रस्तुत ग्रन्थ के कर्ता श्री सिंहल का विचार है कि पद्मिनी रणथम्भौर से सम्बन्धित है और रणथम्भौर के किले में कुछ स्थलों के नाम इसके प्रमाण हैं। उनके विचार से पद्मिनी महाराज हम्मीर की पुत्री थी। सत्य क्या है इसका निर्णय तो इतिहासकार ही कर सकते हैं, परन्तु राणा रत्नसेन और महाराज हम्मीर का समकालीन होना तो इतिहास-सिद्ध है ही और यह भी कि दोनों का युद्ध अलाउद्दीन खिलजी से हुआ था। जोधराज कृत ‘हम्मीर-रासो, से इस बात की भी पुष्टि होती है कि अलाउद्दीन पर विजय प्राप्त करके महाराज हम्मीर शत्रुओं से छीनी हुई विजय की ध्वजाओं को आगे किये गढ़ लौटे तो उनकी सेना को शत्रु की विजयी सेना समझकर तब तक रानी परिवार की वीर महिलाओं के साथ अग्नि में प्रवेश कर चुकी थीं। यह देखकर दुखी हम्मीर ने अपने सैनिकों को आज्ञा दी कि चित्तौड़ जाकर कुँवर रत्नसेन की रक्षा करें। ‘कुँवर’ शब्द का प्रयोग जहाँ सिंहासनासीन होने से पूर्व ‘राजकुमार’ होने की अवस्था के लिए होता है, वहीं ‘जामाता’ के लिए भी होता है। यदि यह वर्णन सही है तो रत्नसेन हम्मीर के जामाता हो सकते हैं और यदि सचमुच ऐसा है तो श्री सिंहल की ‘सिंहल’ और ‘पद्मिनी’ विषयक धारणा में भी बल हो सकता है। विद्वानों को इस पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए और जब तक इसका सप्रमाण खण्डन न हो जाय, इसे स्वीकार किया जाना चाहिए।
Rani Padmini
ISBN: 9352296729
ISBN 13: 9789352296729
Publication Date: 2017
Publisher: Vani Prakashan
Pages: 274
Format: Hardcover
Author: Brajendra Kumar Singhal